खुदगर्ज ये खुशियां
घूंटन हैं ये सिसकियां
ना तराशो खुदा के लिये
बिखर जाउंगी मिट्टी के लिये
इत्नी ना इंतहा लो के
मरके भी जिंदा हो जी जाऊ
पलके रूठी बिछाये सपनो में
सांसो के करीब आगोश मे
हमतुम कहानी के मुखपॄष्ठमें
शूरू से अंतिम प्रकरणके पन्ने मे
एक तुम ही तो हो जो सबकुछ जानते हो बोलोना
दिदारे हाल हुं बेहाल जानता हुं बोलोना ...!!
----रेखा शुक्ला
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