हस्ताक्षर पे साईन किजिये "ओटोग्राफ प्लीझ"
जुर्माना भरीये कागज से कविता चिखती हैं क्युं
मुठ्ठीभर अक्षर एक इन्तजार एक इल्झाम प्लीझ
दूर निहारा करते हैं सरकते समय को मुट्ठी में क्यु
इश्क कमल चल संभल तपती निगाहे सुन प्लीझ
निगेह्बारी मे बंद चारमिनार, चांद हथेली मे क्युं
सजा लो आके मौन बोले करलो ना एतबार प्लीझ
घूंघटा ओढे सुबहा आई शाम से वो मिलवाने क्युं
---रेखा शुक्ला