બુધવાર, 18 માર્ચ, 2020

कैसे बिसरुं तुम्हैं? काश तुम आ जाती ...!!


पुराना हो गया हुं फिरभी तुम्हारा हुं... पार्टीशन हो गया धर बदल गया पर जडसे  नही उखडा हुं... हा, थोडा कम देखता हुं पर दूरका सब देखता हुं. मेरी बुढी आंखे याद करती है करीमचाचाको पता नही पर दूर दूर से साफ देखती याद करती है.. शाखे फिर से निकली थी फिरसे इसी घरमें पूरी जिंदगी गुजारने के लिये तैयार हुं काश तुम आ जाती...!! वही घर हैं, करीमचाचा और वो पूरानी अलमारी नक्शीकाम वाली... उसमे तुम्हारा बुना स्वेटर और दादाजी की अलमारीमें पूरी तूफानी यादे अभी भी बंद हैं... काश तुम आ जाती...!! पर ये घर तो एन्टीक अलमारी से भी पूराना दादाजीके दादाजीका है और इसी कमरेंमें तो में पैदा हुआ था... पर तुम्है थोडा पता था?  वो तो बूआ थी जो दीदीको बोल रही थी उनकी शादी के बाद तब मुजे पता चला था.वो  केह रही थी जब तक मैं जिन्दा हुं तुम इस घर को देखलो...  मिल लो इन दीवारों को ... मीट्टी तरस गई हैं आ के कर्ज चूका दो..!! काश तुम आ जाती..!! पूरानी चद्दर में पडी सलवटें... पुरानी बातें.. मीठ्ठी बातें काश तुम आ जाती. ये महेंक तो उनके हाथों की बनाई रसोई से आती थी.. अभी भी वही महेंक रसोईघर में बस गई हैं, ग्रामोफोन पर बजतें वो मधुरें गाने देखो अभी भी आंखे भर जाती हैं... काश तुम आ जाती...!!

वक्त और आबादी आधा कब्रस्तान खा गई, अब अच्छी मिट्टीमें बोये जाये बीज तो तेरे और मेरे की नई जडायें बनाई जाये... पर काश तुम आ जाती..!! किताबों से कभी गुजरों तो युं मिलते हैं किरदार गये वक्तकी जोडीमें घडे कुछ यार दोस्त मिलते हैं जिसे हम याद करतें हैं उसीमें शहरो की तासीर मिलती है.. खुली हवामें तेरा बाल सुखाना तेरी लटोंको तुजे परेशान करना...सजे गुलाब बालों में और गुलाब की महेंक का मुजमे खो जाना, काश ये तस्वीर से निकलकर सामने आ जाती...हमने बोया था पौधा वो घनघोर वॄक्ष बन गया हैं .. उसकी घनी छांवमें जमीं पे पडे फूलोकी चादर पे सोना कित्ना अच्छा लगता है... काश तुम आ जाती...!!

कुछ याद आया ये लम्बे लम्बे बालवाला कौन था तुम्हारे साथ में ?? तुम्हारे अम्मीके पास ले जानेका बहाना करके ले गया... लोग केहते हैं तुम्हारे ही अब्बुने तुम्हैं बेच डाला.. कोई केहता हैं तुम्हारी शादी हो गई !! एक हप्ता हो गया आंखे रो रो के सुज गई.. काश तुम आ जाती..!! देखोना महिने में तुम्हारी कित्नी तस्वीर बनाली मैंने... तुमसे तुमको मांगा था... वक्त मिल गया पर तुम कभी ना आई... काश तुम आ जाती...!! ये शाम युं ही ढल जायेगी.. दीवारों ने बाते सुनना बंध कर दिया है..इन रुखी सुखी आंखेभी इन्तजार करना बंध करदे उस्से पहेले काश तुम आ जाती..!! आयना कित्ना धुंधला हो गया हैं.. वैसे
मैंने उन्से मिलना बंध किया हैं. ये ढलता सूरज मेरी तरहा पानीमें डूब जायेगा... रंग बदल जायेगा. आंगन मे तेरी मेना कूक करने नहीं आती हैं! वो सुबहा कभी आ जाती की सूरज की धूप आंगन आनेसे पहेले तुम आंगनमे खडी बाल सूखाती... काश तुम आ जाती वो मेना की कूक सुनने को कान तरस गये हैं ! सब छोड कर आ जाती वही वजूद और मक्सद हैं इन सांसोका. सुनो आज करीमचाचा ने फिर से हमारी तस्वीर तकिये के नीचे देखली है...तुम शरम से पानी पानी हो गई थी और मैं हंस पडा था... देखो आज भी हंस पडा हुं बुरा मत मानना...गुस्से मे तेरी लटोंको सुलझानेमें तेरी महेंदू तेरे कान पे लग गई थी..और मैं हंसा और करीमचाचाने खींचली तस्वीर..है ना..हाथ फैला कर खडा हुं काश तुम आ के समा जाती...!!
 -- रेखा शुक्ला 


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